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بَلْ هُوَ اٰيٰتٌۢ بَيِّنٰتٌ فِيْ صُدُوْرِ الَّذِيْنَ اُوْتُوا الْعِلْمَۗ وَمَا يَجْحَدُ بِاٰيٰتِنَآ اِلَّا الظّٰلِمُوْنَ  ( العنكبوت: ٤٩ )

Nay
بَلْ
बल्कि
it
هُوَ
वो
(is) Verses
ءَايَٰتٌۢ
आयात हैं
clear
بَيِّنَٰتٌ
वाज़ेह
in
فِى
सीनों में
(the) breasts
صُدُورِ
सीनों में
(of) those who
ٱلَّذِينَ
उन लोगों के जो
are given
أُوتُوا۟
दिए गए
the knowledge
ٱلْعِلْمَۚ
इल्म
And not
وَمَا
और नहीं
reject
يَجْحَدُ
इन्कार करते
Our Verses
بِـَٔايَٰتِنَآ
हमारी आयात का
except
إِلَّا
मगर
the wrongdoers
ٱلظَّٰلِمُونَ
जो ज़ालिम हैं

Bal huwa ayatun bayyinatun fee sudoori allatheena ootoo al'ilma wama yajhadu biayatina illa alththalimoona (al-ʿAnkabūt 29:49)

Muhammad Faruq Khan Sultanpuri & Muhammad Ahmed:

नहीं, बल्कि वे तो उन लोगों के सीनों में विद्यमान खुली निशानियाँ है, जिन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ है। हमारी आयतों का इनकार तो केवल ज़ालिम ही करते है

English Sahih:

Rather, it [i.e., the Quran] is distinct verses [preserved] within the breasts of those who have been given knowledge. And none reject Our verses except the wrongdoers. ([29] Al-'Ankabut : 49)

1 Suhel Farooq Khan/Saifur Rahman Nadwi

मगर जिन लोगों को (ख़ुदा की तरफ से) इल्म अता हुआ है उनके दिल में ये (क़ुरान) वाजेए व रौशन आयतें हैं और सरकशी के सिवा हमारी आयतो से कोई इन्कार नहीं करता