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لَيْسَ لَكَ مِنَ الْاَمْرِ شَيْءٌ اَوْ يَتُوْبَ عَلَيْهِمْ اَوْ يُعَذِّبَهُمْ فَاِنَّهُمْ ظٰلِمُوْنَ   ( آل عمران: ١٢٨ )

Not
لَيْسَ
नहीं है
for you
لَكَ
आपके लिए
of
مِنَ
मामला में से
the decision
ٱلْأَمْرِ
मामला में से
(of) anything
شَىْءٌ
कुछ भी
whether
أَوْ
ख़्वाह
He turns
يَتُوبَ
वो मेहरबान हो जाए
to them
عَلَيْهِمْ
उन पर
or
أَوْ
या
punishes them
يُعَذِّبَهُمْ
वो अज़ाब दे उन्हें
for indeed they
فَإِنَّهُمْ
तो बेशक वो
(are) wrongdoers
ظَٰلِمُونَ
ज़ालिम हैं

Laysa laka mina alamri shayon aw yatooba 'alayhim aw yu'aththibahum fainnahum thalimoona (ʾĀl ʿImrān 3:128)

Muhammad Faruq Khan Sultanpuri & Muhammad Ahmed:

तुम्हें इस मामले में कोई अधिकार नहीं - चाहे वह उसकी तौबा क़बूल करे या उन्हें यातना दे, क्योंकि वे अत्याचारी है

English Sahih:

Not for you, [O Muhammad, but for Allah], is the decision whether He should [cut them down] or forgive them or punish them, for indeed, they are wrongdoers. ([3] Ali 'Imran : 128)

1 Suhel Farooq Khan/Saifur Rahman Nadwi

(ऐ रसूल) तुम्हारा तो इसमें कुछ बस नहीं चाहे ख़ुदा उनकी तौबा कुबूल करे या उनको सज़ा दे क्योंकि वह ज़ालिम तो ज़रूर हैं